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आयुर्वेद के पाँच चमत्कारी चूर्ण

आयुर्वेद के पाँच चमत्कारी चूर्ण

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यहाँ कुछ ऐसे योग दिये जा रहे है जो शास्त्रोक्त है , यानि प्राचीन शास्त्रों में इनका वर्णन है | अनेक आयुर्वेद औष्धि निर्माता इनका इसी नाम से निर्माण करते है | अत: मार्किट में उपलब्ध रहते है |

1 पंचसकार चूर्ण
सौंठ , सौंफ , सनाय , सेंधा नमक , और छोट़ी हरड़ सबको कूटकर चूर्ण बना लें | 
मात्रा - ३-६ ग्राम तक रात को सोने से पहले जल से |

उपयोग - यह चूरण सोम्य विरेचक है | कब्ज , आमवृद्धि , सिरदर्द, अजीर्ण , उदरवात , अफारा , उदरशूल , गुदशूल आदि दोषों को दूरकर पाचन क्रिया सुधारता है |

पंचसकार चूर्ण अर्शरोग , आमप्रकोप , जीर्ण आमवात में संधि स्थानों की पीड़ा , मलावरोध तथा नये अम्लपित्त के रोगियों के लिएअमृत है |

2 प्रदरांतक चूर्ण
चिकनी सुपारी , माजुफल , चौलाई जड़ , धाय फूल , सव्रण गेरिक , मोचरस , पठानी लोध और राल
सबको बारीक चूर्ण कर लें फिर सबके बराबर मिश्री डाल लें | 

मात्रा - ५-१० ग्राम तक | चावलों के धावन से दिन में दो- तीन बार | 
उपयोग - यह चूर्ण गर्भाशय आदि प्रजनन संस्थान पर शामक प्रभाव डालता है | इसके सेवन से श्वेत और रक्त प्रदर दूर होते है तथा गर्भाशय और बीजाशय सुदृढ़ होते है |

विशेष - गर्भाशय में शोथ होने से यदि प्रदर के स्राव से मुर्दे जैसी दुर्गन्ध आती है तब इस चूरण का उपयोग नही करना चाहिए |

3 रज: प्रवर्तक चूर्ण
भारंगी , काली मिर्च , पीपल , सौठ - ये सब ८०-८० ग्राम और भुनी हींग ३० ग्राम | सबको कूटपीसकर चूर्ण करें |
मात्रा - २-३ ग्राम ब्राह्मी १० ग्राम , काले तिल ५० ग्राम के क्वाथ के साथ दें | माशिक धर्म आने के समय से १० दिन पहले दें |

उपयोग - इसके उपयोग से माशिक धर्म बिना कष्ट बिना दर्द आने लगता है | 
विशेष - सामान्यत : इस चूर्ण का सेवन १५- ३५ वर्ष तक की आयु वाली स्रियों को ही करना चाहिए | पेट में कब्ज न रहने दें |

4 वीर्य शोधन चूर्ण
बबूल की बिना बीज वाली कच्ची फली , बबूल की कोपल , बबूल गोंद - सबको समभाग लेकर चूर्ण करें | 
मात्रा - ४-६ ग्राम तक मिश्री मिलाकर लें | ऊपर से दूध पिएं |

उपयोग - वीर्य सोधन चूर्ण के सेवन से वीर्य का पतलापन , शुक्रमेह , धातु दोष दूर होकर वीर्य गाढ़ा होता है |

5 मूत्र विरेचक चूर्ण
शीतलचीनी , रेवन्दचीनी , छोटी इलायची  , और जीरा प्रत्येक १०-१० ग्राम , कलमी शोरा २० ग्राम , मिश्री ४० ग्राम | सबको कपड़छान चूर्ण कर लें |

मात्रा - ३ ग्राम दूध जल की लस्सी के साथ | ३-४ बार दिन में २-२घण्टे पर |
उपयोग - यह चूर्ण मुत्रोत्पति बढ़ाता है | सुजाक में पूव दूर करनेमें और मूत्र साफ लाने में बहुत उपयोगी है | भोजन में केवल दूध भात खाना चाहिए |