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शीतला बुखार (Chickenpox) का आयुर्वेदीक उपचार।


परिचय :
   शीतला बुखार दो प्रकार का होता है, पहला-छोटी माता, दूसरा-बड़ी माता। छोटी माता को शीतला तथा बड़ी माता को `चेचक´ या `खसरा´ भी कहा जाता है। एलोपैथी में छोटी माता को `चिकिन पॉक्स´ तथा बड़ी माता को `स्माल पॉक्स´ कहा जाता है। बड़ी माता `खसरा´ में राई जैसी छोटी-छोटी फुंसियां शरीर पर निकलती है और बुखार आता है। बुखार का ताप लगभग 2 दिन बाद कम हो जाता है और फुंसियां भी मिट जाती हैं। यह रोग छोटे बच्चों को तथा मार्च के महीनें में अधिक होता है।

`छोटी माता´ या चिकन पॉक्स´ में पहले बुखार आता हैं फिर पीठ पर छोटी-छोटी फुंसियां निकलती हैं, जो चौथे-पांचवे दिन सूखकर समाप्त हो जाती है।

`बड़ी माता´ या `स्माल पॉक्स´ में पूरे शरीर पर मसूर के दानों जैसी या उससे भी बड़े आकार की फुंसियां निकलती हैं। इस रोग में फुंसियों का दूर-दूर तथा सफेद रंग की होना अच्छा रहता है। यह रोग एक प्रकार के विष से उत्पन्न हुआ माना जाता है। इसे संक्रामक (छूत) रोग भी कह जाता हैं। दोनों प्रकार के रोगों में रोगी को तेज बुखार चढ़ता है, आंखें दुखती है तथा सांस लेने में कष्ट होता है। अगर माता के रोग के साथ कोई बीमारी नहीं हैं, तो यह बीमारी बिना किसी औषधि के 5-7 दिन में या अधिक से अधिक 21 दिन में अपने आप ही ठीक हो जाती है। डॉक्टरों के अनुसार `चेचका का टीका´ लगा सकते हैं। टीका लगवाने के बाद या तो चेचक निकलती ही नहीं है और यदि निकलती भी है तो बहुत हल्की रहती है।

विभिन्न औषधियों से उपचार-

1. लिसौड़े : 
लिसौड़े की छाल को पीसकर उसका लेप आंखों पर लगाने से शीतला (छोटी माता) बुखार होने के कारण होने वाले आंखों के दर्द में आराम मिलता है।

2. नीम : 
शीतला (छोटी माता) निकलने पर नीम के ताजे पत्तें रोगी के सिरहाने पर रखने चाहिए तथा रोगी के घर की चौखट पर नीम के पत्ते बांध देनी चाहिए।

3. पटोल :
पटोल के पत्ते, सारिया, नागरमोथा, पाढ़, कुटकी, खैर, नीम, खिरेंटी, आंवला तथा कटाई को एकसाथ मिलाकर काढ़ा बनाकर पीने से वातज मसूरिका दूर हो जाती है। 

पटोल की जड़ या पटोल के पत्ते का काढ़ा गन्ने की जड़ के रस के साथ पीने से पित्त मसूरिका में लाभ होता है। 

पटोल के पत्ते, गिलोय, नागरमोथा, अड़ूसा, धनिया, जवासा, चिरायता, नीम, कुटकी और पित्तपापड़ा को एकसाथ मिलाकर पीसकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े को पीने से बिना पकी मसूरिका नष्ट होती है और पकी हुई मसूरिका जल्दी ही सूख जाती हैं। 

4. लाल चंदन : 
लाल चंदन, अडूसा, गिलोय, नागरमोथा तथा दाख का काढ़ा पीने से मसूरिका बुखार में आराम मिलता है।

5. चावल : 
चावल का पानी बनाकर पांवों के तलुवों की फुंसियों पर लगाने से शीतला बुखार के कारण होने वाली जलन शान्त हो जाती है।

6. आमाहल्दी : 
आमाहल्दी, सरकण्डे की जड़ और जलाई हुई कौड़ी को कूटकर छान लें। फिर इसे भैंस के दूध में मिलाकर, रात के समय चेहरे पर लगाकर सो जाएं तथा पानी में भूसी को भिगो दें। सुबह और शाम उसी भूसी वाले पानी से मुंह को धोने से माता के द्वारा होने निशान (दाग-धब्बे) दूर हो जाते हैं।

7. गिलोय : 
गिलोय, मुलहठी, रास्ना, लघु पंचमूल, लाल चंदन, कुंभेर के फल, खिरेंटी और कटाई आदि को मिलाकर पीसकर काढ़ा वातज मसूरिका के पकने या भरने के समय पीने से लाभ होता है।

8. सिरस : 
सिरस के पेड़ की छाल, पीपल की छाल, लिसौढ़े की छाल तथा गूलर की छाल आदि को पीसकर छान लें। इस चूर्ण को गाय के घी में मिलाकर चेचक के दानों (दानों में जलन) पर लगाने से जलन शान्त होती है।

9. बरगद : 
बरगद, गूलर, पीपल, पाकर और मौलश्री को मिलाकर पीसकर घावों या चेचक के दानों (मसूरिका) पर छिड़कना चाहिए।

10. गोबर : 
गोबर के कण्डों (उपलें) की राख को चेचक के दानों पर लगाने से लाभ होता है।

11. धमासा : धमासा, पित्तपापड़ा, पटोल के पत्ते तथा कुटकी का काढ़ा बनाकर पीने से कफज और पित्तज मसूरिका (छोटी माता) में लाभ होता है।

12. तुलसी : 
तुलसी के पत्तों के रस के साथ अजवायन को पीसकर लगाने से अन्दर दबी हुई माता बाहर निकल जाती है।

13. जावित्री : 
जावित्री को थोड़े-थोड़े समय के बाद खाने से रुकी या दबी हुई माता निकल कर आ जाती है और रोगी कुछ ही समय में ठीक हो जाता है।

14. बेर : 
बेर का चूर्ण गुड़ के साथ खाने से वात, पित्त तथा हर प्रकार की माता तुरन्त पक जाती है।

15. अरनी : 
बड़ी अरनी की जड़ को मस्तक पर बांधने से शीतज्वर नष्ट हो जाता है।

16. करेला : 
शीतला बुखार में ठंड लगने से पहले ही रोगी को करेले के 10 से 15 मिलीलीटर रस में जीरे का चूर्ण मिलाकर दिन में 3 बार पिलाना चाहिए।

17. गूलर :
गूलर के रस में मिश्री डालकर बच्चों को पिलाने से शीतला (चेचक) की गर्मी दूर होती है। 

गूलर के पत्तों पर उठे हुए कांटों को गाय के ताजे दूध में पीसकर उनका रस निकाल लें। फिर उसमें थोड़ी सी शक्कर डालकर रोगी की शक्ति के अनुसार देना चाहिए। इस औषधि को शीतला (चेचक) का ज्वर (बुखार) आते ही पी लेने से शीतला (चेचक) कम हो जाती है। 
अन्य उपचार : 

रोगी के रहने वाले स्थान तथा ओढ़ने, बिछाने और पहनने वाले कपड़ों आदि को साफ-सुथरा रखना चाहिए। रोगी के ओढ़ने की चादर को रोजाना बदल देना चाहिए। 

शीतला (छोटी माता) रोग में जो व्यक्ति रोगी की देखभाल नहीं कर रहा हो, उसे रोगी के पास नहीं जाना चाहिए जैसे- रजस्वला स्त्री (मासिक धर्म से पीड़ित स्त्री), छोटे बच्चे, अपवित्र, गन्दे तथा अन्य स्वस्थ व्यक्ति आदि। 

मसूरिका बुखार में रोगी को ठंड़ी हवा से बचाना चाहिए, परतु इसमें ठंडा पानी पीना लाभकारी होता है। 

सावधानी : 
शीतला (छोटी माता) के दाने होने पर उनमें खुजली मचने लगती है जिनमें खुजली करने से जख्म से बन जाते हैं जो बहुत ही परेशान करते है तथा शरीर पर जीवन भर उनके निशान बने रहते है। आंखे खुजलाने से अंधे हो जाने का डर बन रहता है इसलिए इन्हे भी खुजाना नहीं चाहिए। छोटे बच्चों को यह रोग हो जाने पर उनके दोनों हाथों में कपड़ें बांधकर रखने चाहिए ताकि वह दानों को खुजला न सकें।

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